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प्राचीन वैदिक/हिंदू विद्यालयों का पुरातात्विक प्रमाण!!!

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नास्तिकों के दावो का खंडन प्राचीन वैदिक/हिंदू विद्यालयों का पुरातात्विक प्रमाण!!! By  Bhoot baba   -  November 29, 2021 पाठकों! अनेकों नवबौद्ध यह आरोप करते हैं कि बौद्धों के नालंदा और विक्रमशिला जैसे महाविद्यालय थे किंतु वैदिकों या हिंदुओं के गुरुकुलों का कोई भी पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। इस दावे के साथ यह लोग कहते हैं कि भारत में सारा प्राचीन ज्ञान - विज्ञान बौद्धों की ही देन है, इसी के साथ - साथ यह लोग आर्यभट, भास्कराचार्य को काल्पनिक तथा उनके योगदान को चोरी किया हुआ बताते हैं। यहां हम यह कहना चाहते हैं कि नालंदा व विक्रमशिला बौद्ध महाविद्यालय थे किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उस समय वैदिक विश्व विद्यालय न थे। इस लेख में तथा आगामी लेखों में हम वैदिक/ हिंदू शिक्षा केद्रों के पुरातात्विक प्रमाण प्रस्तुत करेगें। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन काल में वैदिक लोग वनों, वृक्षों के नीचे, गोबर से लीपे आश्रमों जैसी छोटी जगहों पर भी शिक्षा देते थे (कुछ जगह मंदिरों, मठों और पक्की इमारतों में भी शिक्षा दी जाती थी, जो कि आगामी लेखों में रहस्योद्घाटन होगा) क्योंकि वह बाहरी दि...

पाकिस्तानच्या चुकांपासून भारताने शिकण्याची गरज

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पाकिस्तानच्या चुकांपासून भारताने शिकण्याची गरज – Marathisrushti Articles पाकिस्तान मध्ये    चीनी व्हायरसचे थैमान आणि भारत  लष्करप्रमुखांकडून पाकिस्तानची निंदा भारतासह संपूर्ण जग सध्या कोरोना विषाणू संक्रमण रोखण्यासाठी लढत असताना पाकिस्तानकडून नियंत्रण रेषेवर शस्त्रसंधीचे उल्लंघन करून गोळीबार करण्यात येत असल्यावरून लष्करप्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे यांनी तीव्र शब्दांत निंदा केली. या कठीण प्रसंगातही पाकिस्तानने आपल्या वृत्तीत किंचितही बदल केलेला नाही. हा लेख मराठीसृष्टी (www.marathisrushti.com) या वेबसाईटवर प्रकाशित झाला आहे. लेख शेअर करायचा असल्यास लेखकाच्या नावासह शेवटपर्यंत संपूर्णपणे शेअर करावा... जनरल नरवणे म्हणाले की, कोरोना संक्रमणामुळे जगातील सगळेच देश या विषाणूविरोधात लढा देत आहेत. पण पाकिस्तानने याही स्थितीत आपल्या कारवाया करणे सुरूच ठेवले आहे. या कठीण प्रसंगात भारत जगातील इतर देशांना वैद्यकीय स्वरुपाची मदत करतो आहे. औषधे, वैद्यकीय साधने निर्यात करण्यात येत आहेत. पण दुसऱ्या बाजूला पाकिस्तानकडून दहशतवाद निर्यात करण्याचे काम वेगाने सुरूच आहे.काश्मीर खोऱ्यातील केरान...

गणेशपञ्चरत्नम्

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गणेशपञ्चरत्नम् – मराठी अर्थासह – Marathisrushti Articles श्री आदि शंकराचार्य विरचित गणेशपञ्चरत्नम् – मराठी अर्थासह आदि शंकराचार्यांनी रचलेल्या या श्री गणेशाच्या स्तुतीपर स्तोत्रात पाच श्लोक आहेत. सहावा फलश्रुतीचा आहे. यातील श्लोकांचे / चरणांचे विविध अभ्यासकांनी वेगवेगळे अर्थ लावलेले दिसतात. हा लेख मराठीसृष्टी (www.marathisrushti.com) या वेबसाईटवर प्रकाशित झाला आहे. लेख शेअर करायचा असल्यास लेखकाच्या नावासह शेवटपर्यंत संपूर्णपणे शेअर करावा... गणपतीच्या हातात मोदक असतो व तो त्याला खूप आवडतो. त्याचे स्वतःचे स्वरूप आनंदमय असून तो इतरांच्या जीवनात मोद (हर्ष) निर्माण करतो म्हणून त्याने मोदक हातात घेतला आहे. विलासिलोकरंजक या शब्दावरून ‘ गणराज रंगी नाचतो ’ या गाण्याची आठवण आल्याशिवाय रहाणार नाही. ‘इभदैत्य’ या शब्दाचा अर्थ गजासुर असा घेण्याऐवजी कामक्रोधादि षड्रिपू यांना महाभयंकर राक्षस कल्पून गजानन त्यांचा नाश करतो असाही घेतला आहे. गणपतीच्या संदर्भात गज हा शब्द नेहेमी येतो. काही अभ्यासकांनी ‘गज’ हा ‘जग’ च्या उलटा आहे, म्हणून सगुण साकार ‘जगा’च्या विपरीत ‘गज’ निर्गुण निराकार असे मानून गजेश्वर म्हण...

किस देवता के थे कितने और कौन-से पुत्र जानिए...

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किस देवता के थे कितने और कौन-से पुत्र जानिए... > Share"> शुक्रवार, 1 जुलाई 2016 (14:53 IST) हिन्दू धर्म में प्राचीनकाल के मानवों में देव (सुर) और दैत्य (असुर) दो तरह के भेद के अलावा  और भी कई तरह के भेद थे। जैसे दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर, वानर, नाग, किरात, विद्याधर, चारण, ऋक्ष, भल्ल, वसु, सिद्ध, पिशाच, मरुद्गण, भाट आदि। हिन्दुओं के प्रारंभिक इतिहास में उपरोक्त सभी जातियों के लोगों ने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान, विज्ञान, ज्योतिष आदि की स्थापना की और जिनके कारण कई तरह की घटनाओं का जन्म हुआ।   हिन्दुओं के प्रमुख वंश, जानिए अपने पूर्वजों को हजारों वर्षों के इतिहास कालक्रम के चलते ये सभी लोग अब मिथकीय माने जाते हैं, लेकिन इस पर अच्छे से शोध करेंगे तो पता चलेगा कि अपने-अपने वंश को आगे बढ़ाने, भूमि पर साम्राज्य स्थापित करने और अपने रक्त की शुद्धता बनाने रखने की एक जिद थी जिसके चलते संघर्ष का जन्म हुआ और इसी संघर्ष से नई-नई जातियों और प्रजातियों का जन्म होता गया। खैर...!  आओ हम जानते हैं प्रारंभिक काल के इन देवताओं और लोगों के पुत्रों के बारे में...   ...

मनु स्मृति कितना पुराना ग्रंथ है, जानिए एक सचाई...

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मनु स्मृति कितना पुराना ग्रंथ है, जानिए एक सचाई... > Share"> शुक्रवार, 11 मार्च 2016 (12:10 IST) अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।  दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु: समलक्षणम्।। मनु 1/13    टिप्पणी :  कुछ लोग बगैर किसी आधार के मानते हैं कि कोई दो हजार साल पहले ब्राह्मणों ने 'मनुस्मृति' की रचना उस वक्त की जब देश से ब्राह्मणों और ब्राह्मणवादी विचारों का वर्चस्व खत्म हो रहा था। ऐसे में ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व को पुन: स्थापित करने के लिए मनु स्मृति लिखी और इसमें ब्राह्मणों को देवतुल्य घोषित किया गया। लेकिन ऐसा मानने वाले इतिहास को गहराई से शायद ही जानते होंगे। यदि वे गुलामी के काल का अच्छे से अध्ययन कर लेते, तो संभवत: ऐसा नहीं मानते। लेकिन यह भी सच ही है कि दुनिया के कानून का नक्षा मनु स्मृति को आधार मानकर ही बनाया गया है।   यदि वेद कंठस्थ नहीं होते और वे विशेष छंदों में नहीं लिखे गए होते, तो उनका हाल भी मनु स्मृति की तरह होता। तब हिन्दू समाज को विभाजित करने के लिए एक और ग्रंथ मिल जाता। यहां पहली बात यह समझने की है कि मनु स्मृति को कभी भी हिन्दुओं ने अपना धर्मग्रं...

दाते पंचाग कर्ते पंडित धुंडिराजशास्त्री ऊर्फ अण्णा लक्ष्मण दाते

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दाते पंचाग कर्ते पंडित धुंडिराजशास्त्री ऊर्फ अण्णा लक्ष्मण दाते – Marathisrushti Articles भारतीय कालगणना सांगणारी आणि भारताच्या सामाजिक, आर्थिक जडणघडणीचा महत्त्वाचा भाग असलेली परंपरा म्हणजे पंचांगाची परंपरा. पंचांग म्हटले, की पहिले नाव डोळ्यांसमोर येते ते दाते पंचांगाचे. १९०६ मध्ये लोकमान्य टिळकांनी ज्योतिष परिषदेत ‘पंचांग हा आकाशाचा आरसा आहे. पंचांगातील गणित आकाशात दिसले पाहिजे,’ असे वक्तव्य केले होते. त्या काळी पंचांगामध्ये एकवाक्यता नव्हती. मतभिन्नता होती. गणित एकच असताना फरक का? या जिज्ञासेपोटी लक्ष्मण गोपाळ ऊर्फ नाना दाते यांनी पंचांगाचे गणित तयार करून शके १८३८ म्हणजे १९१६-१७ या वर्षीचे पाहिले दाते पंचांग प्रसिद्ध केले. त्यानंतर १९४६-४७ पासून धुंडिराजशास्त्री दाते हे आपल्या वडीलांच्या पंचांगाच्या कामात पूर्णपणे मदत करू लागले. दाते पंचांगाचे रूपांतर वृक्षामध्ये होण्यासाठी अण्णा दाते यांचे योगदान फार मोलाचे ठरले. दिवसेंदिवस पंचांगाचा खप वाढत चालला आणि ज्योतिषांना व पंचांगाचा अभ्यास करणार्यांचना दाते पंचांग हे ‘रेफरन्स बुक’ म्हणून उपयोगी पडू लागले. महाराष्ट्रात ‘पंचांग म्हणजे दाते पं...

मनु-सतरूपा के घोर तप से हुई आकाशवाणी

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मनु-सतरूपा के घोर तप से हुई आकाशवाणी Publish Date: Sun, 21 Sep 2014 11:07 PM (IST) ... भदोही : मर्यादपंट्टी स्थित रामलीला मैदान में लीला मंचन की दूसरी निशां पर शनिवार को मनु, सतरूपा तप, मेघनाद दिग्विजय व कुंभकरण का मंचन वृंदावन से आए कलाकारों द्वारा किया गया। राजा मनु व सतरूपा हजारों वर्ष कठोर तपस्या करते हैं। तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिदेव उन्हें मुंह मांगा वर मांगने को कहते हैं। बावजूद इसके वे तप में लीन रहते हैं। एक दिन आकाशवाणी होती है, जिस पर सतरूपा द्वारा प्रभु से उनके जैसे बेटे की मांग की जाती है। प्रभु कहते हैं, यह संभव नहीं है, लेकिन अगले जन्म में मैं आप के पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। कलांतर में चलकर मनु राजा दशरथ तथा सतरूपा रानी कौशिल्या के रूप में जन्म लेते हैं, तथा उनके घर स्वयं प्रभु श्रीराम भगवान के रूप में अवतरित होते हैं। वहीं दूसरी तरफ रावण, कुंभकरण तथा विभीषण के रूप में तीन पुत्र ऋषि विशेसरवा के यहां जन्म लेते हैं। रावण बड़ा ही बलशाली था, उसने अपने पराक्रम से लंका जीत लिया। तत्पश्चात तीनों भाई घोर तपस्या करने लगते हैं। इस दौरान ब्रह्मा से वर मांगते हैं। लीला के अंत म...