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प्राचीन वैदिक/हिंदू विद्यालयों का पुरातात्विक प्रमाण!!!

प्राचीन वैदिक/हिंदू विद्यालयों का पुरातात्विक प्रमाण!!!

 
पाठकों! अनेकों नवबौद्ध यह आरोप करते हैं कि बौद्धों के नालंदा और विक्रमशिला जैसे महाविद्यालय थे किंतु वैदिकों या हिंदुओं के गुरुकुलों का कोई भी पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। इस दावे के साथ यह लोग कहते हैं कि भारत में सारा प्राचीन ज्ञान - विज्ञान बौद्धों की ही देन है, इसी के साथ - साथ यह लोग आर्यभट, भास्कराचार्य को काल्पनिक तथा उनके योगदान को चोरी किया हुआ बताते हैं। यहां हम यह कहना चाहते हैं कि नालंदा व विक्रमशिला बौद्ध महाविद्यालय थे किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उस समय वैदिक विश्व विद्यालय न थे। इस लेख में तथा आगामी लेखों में हम वैदिक/ हिंदू शिक्षा केद्रों के पुरातात्विक प्रमाण प्रस्तुत करेगें। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन काल में वैदिक लोग वनों, वृक्षों के नीचे, गोबर से लीपे आश्रमों जैसी छोटी जगहों पर भी शिक्षा देते थे (कुछ जगह मंदिरों, मठों और पक्की इमारतों में भी शिक्षा दी जाती थी, जो कि आगामी लेखों में रहस्योद्घाटन होगा) क्योंकि वह बाहरी दिखावे की जगह शिक्षा को महत्व देते थे। इस कारण हमें प्राचीन वैदिक विद्यालयों की ईमारते न मिले किंतु कुछ मोहरें अवश्य मिलती हैं जो कि प्राचीन वैदिक विद्यालयों के अस्तित्व को पुरातात्विक रुप से सिद्ध करती हैं। नालंदा और विक्रमशिला एक विशाल भू भाग और ईमारत लिए हुए थे इसलिए वे आज भी नजर आ जाते हैं और अधिक प्रचारित है किंतु इनके सम्मकालीन वैदिक विद्यालय आकार में छोटे जैसा कि ऊपर बताया है, वैसा होने के कारण वर्तमान में उतना प्रचार नहीं प्राप्त कर सके हैं। (हालांकि काशी में वेद विद्या की शिक्षा परम्परागत रुप से अभी भी है) 

प्रस्तुत लेख में हम कुछ मोहरों का प्रमाण देगें, जिनमें वेद चारणों और वेदों के नाम है जो कि इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में उन - उन चारणों के शिक्षा केंद्र प्रचलित थे। ये मोहरें काशी के राजघाट उत्खनन से प्राप्त हुई थी। ये मोहरें गुप्त कालीन ब्राह्मी लिपि में है जो कि नालंदा के समकालीन और विक्रमशिला से प्राचीन है। 
- Vasudeva Sharan Agrawala, A Selection, Section 5, Ch. 49, page no. 641

प्रस्तुत मोहर में ऋग्वेद चारण का नाम गुप्त कालीन ब्राह्मी लिपि में - 
"बह्वृचचरणं" लिखा है जो कि ऋग्वेदीय विद्यालय को सूचित करता है। इस मोहर में एक गुरू है जो जटाजूट धारी है तथा साथ में उसके दो शिष्य हैं। ये वृक्षों के नीचे खडे हैं, सम्भवतः यही शिक्षा स्थल हो! 
इसका रेखा चित्र मोतीचंद्र जी की पुस्तक "काशी का इतिहास (वैदिक काल से अर्वाचीन युग तक का राजनैतिक - सांस्कृतिक सर्वेक्षण) के प्रथम संस्करण के कवर पृष्ठ पर श्री जगन्नाथ अहिवासी द्वारा बनाया गया था - 

- काशी का इतिहास : वैदिक काल से अर्वाचीन युग तक का राजनैतिक - सांस्कृतिक सर्वेक्षण, मुख्य पृष्ठ, प्रथम संस्करण, सिंतबर 1962

इसी तरह की एक और अन्य स्पष्ट मोहर भी दिखाते हैं - 


- Indian Journal Of Archaeology Vol. 6 No. 3, (2021), page no. 384, fig. no. 297

राजघाट से प्राप्त यह मोहर उपरोक्त मोहर जैसी ही है। जिसमें ऋग्वेद के विद्यालय का उल्लेख है। 

- Vasudeva Sharan Agrawala, A Selection, Section 5, Ch. 49, page no. 642

राजघाट से प्राप्त इस मोहर में नंदी के नीचे गुप्त कालीन ब्राह्मी में लिखा है - "चरकाचरण" जो कि कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के विद्यालयों को सूचित करता है। चरक का तात्पर्य कृष्ण यजुर्वेदीय चरण से अनेकों जगह मिलता है - 
- चरणव्यूहसूत्रम् : वैदिक शिरोमणि आचार्य महिदासकृत भाष्यसहितम्, द्वितीय यजुर्वेद खण्ड. १ 

 - Vasudeva Sharan Agrawala, A Selection, Section 5, Ch. 49, page no. 642

छांदोग्य उल्लेखित गुप्तकालीन अनेकों मुद्रायें राजघाट से प्राप्त हुई हैं जो कि सामवेदीय विद्यालयों का पुरातात्विक साक्ष्य है। ऊपर उन्हीं में से एक मोहर का चित्र है जिसमें ब्राह्मी में "छांदोग्य" लिखा है। 

- Artibus Asiae, Vol. 31, No. 2/3, (1969), PP. 179 - 184, fig. 1

राजघाट से प्राप्त इस मोहर के एक तरफ महिषासुरमर्दिनी का चित्रण है तथा दूसरी तरफ ब्रह्मा जी और गुप्त ब्राह्मी में "छांदोग्" लिखा है जो कि सामवेद शाखीय विद्यालयों को सूचित करता है। 


-  Artibus Asiae, Vol. 31, No. 2/3, (1969), PP. 179 - 184, fig. 3 - 5

छांदोग्य अंकित अन्य मोहरें भी आप देख सकते हैं, जो कि राजघाट से प्राप्त हैं - 


- Indian Journal Of Archaeology Vol. 6 No. 3, (2021), page no. 324, fig. no. 235

इस मोहर में ऊपर नन्दी है तथा नीचे छांदोग् लिखा है। ये भी काशी से प्राप्त है। 
इसी प्रकार की अन्य शील भी देखें -


- Indian Journal Of Archaeology Vol. 6 No. 3, (2021),page no. 394, fig. no. 307

यहां आप प्राचीनतम गुप्त कालीन ब्राह्मी की मोहरों से सामवेद शाखीय विद्यालयों की प्राचीनता जान सकते हैं। 

- Vasudeva Sharan Agrawala, A Selection, Section 5, Ch. 49, page no. 643

इस मोहर में एक नंदी और शिवलिंग है तथा इसके नीचे गुप्त ब्राह्मी में चतुर्विद्या लिखा है जो कि चारों वेदों के शिक्षास्थल के रुप में है। काशी खंड में एक शिवलिंग भी है जिसे चतुर्वेदेश्वर भी कहा जाता था। यह मोहर हमें बताती है कि यह एक धार्मिक स्थल की ओर संकेत करती है जहां प्राचीन शिव मंदिर के साथ - साथ चारों वेदों की शिक्षा भी दी जाती थी। 

- Vasudeva Sharan Agrawala, A Selection, Section 5, Ch. 49, page no. 643

इस मोहर पर गुप्तकालीन लिपि में त्रिविद्या लिखा है जो कि तीन विद्याओं ऋक्, यजु और साम के शिक्षा स्थल को सूचित करती है अर्थात यह ऐसे विद्यालय की मोहर है जहां तीनों विद्याओं का अभ्यास कराया जाता था। 


- Vasudeva Sharan Agrawala, A Selection, Section 5, Ch. 49, page no. 643

इस मोहर में शिवलिंग और नंदी के नीचे गुप्त ब्राह्मी में "श्री सर्व्वत्र विद्या" लिखा है। जिसका तात्पर्य ऐसे विद्यालय से है जहां वेद, स्मृति, उपवेद, वेदांग सहित सभी शास्त्रों का अध्ययन करवाया जाता था। 

इन सभी प्रमाणों से सिद्ध होता है कि वेदों और हिंदुओं के विद्यालय प्राचीनकाल से ही अस्तित्व में थे और नव बौद्धों का यह दावा भी धराशायी हो जाता है कि प्राचीनकाल में वैदिक धर्मियों या हिंदुओं का कोई भी विद्यालय नहीं था या गुरुकुल नहीं था। 

संदर्भित ग्रंथ एवं पुस्तकें - 

1) Vasudeva Sharan Agrawala, A Selection - Ed. Kapila Vatsayayan

2) काशी का इतिहास : वैदिक काल से अर्वाचीन युग तक का राजनैतिक - सांस्कृतिक सर्वेक्षण, प्रथम संस्करण, सिंतबर 1962 - डॉ. मोतीचंद्र

3) चरणव्यूहसूत्रम् : वैदिक शिरोमणि आचार्य महिदासकृत भाष्यसहितम् 

4) Artibus Asiae, Vol. 31, No. 2/3, (1969)

5) Indian Journal Of Archaeology Vol. 6 No. 3, (2021)

Comments

  1. अति उत्तम। परन्तु आपने एक विशेष तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि नालंदा सिर्फ बौद्धों का विश्वविद्यालय नहीं था। वहां पर भारत के सभी धर्म और दर्शन पढ़ाए जाते थे। वेद भी। इसका वर्णन इस पुस्तक में है।
    https://books.google.co.in/books?id=lxRHYFd0fB4C&printsec=frontcover#v=snippet&q=Vedas&f=false 

    यह वामपंथी इतिहासकारों द्वारा प्रचलित किया गया झूठ है कि नालंदा तक्षशिला सिर्फ बौद्धों के थे। सत्य तो ये है कि यह विश्वविद्यालय गुप्त साम्राज्य के शासन काल में ही विकसित हुए थे। नालंदा में तू तो कई मंदिर और विहार है लेकिन सबसे प्राचीन Temple 2 है जिसमे हिन्दू देवी दवताओं कि मूर्तियां है।

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